मुहावरा (डूबते को तिनके का सहारा)

tortilis_grande

एक पेड़ था

छातों भरा आकाश में-

मुझे क्या छाँव देगा

मुझे क्या शीतलता देगा

दुःख भरी दुपहरी में?

बेकार का पेड़ है-

पहले मैं सोचता था ।

एक दिन –

मैं गुज़र रहा था

भरी दुपहरी में

बेहाल था, पसीने से  तर-बतर

कुछ सूझ नहीं  रहा था-

उसी छतरी भरी  छाँव में –

तब समझ में आया –

डूबते को तिनके का सहारा॥

—-गुलाब चन्द जैसल

 

 

 

 

 

 

 

 

बुद्ध पूर्णिमा

—गुलाब चंद जैसल ;’चिलमन’

buddha

इसे नियति की एक महती योजना ही समझना चाहिए कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ई. पू. बैसाख पूर्णिमा को हुआ। यह दिवस उनके और उनके अनुयायियों के साथ तब से आज तक जुड़ा हुआ है। भगवान बुद्ध ने बैसाख पूर्णिमा ४८३ ई. पू. में ८० वर्ष की आयु में, देवरिया ज़िले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया। उनका परम प्रिय शिष्य आनन्द, पत्नी यशोधरा, सारथी चन्ना और यहाँ तक की अश्व कटंक भी अपनी जीवन यात्रा का प्रारम्भ करने के लिए इसी दिन जन्मे। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ ने कठिन तपस्या कर बोधिसत्व प्राप्त किया उसका रोपण भी बैसाख पूर्णिमा को ही हुआ था। इसी दिन समाज में पतिता समझी जाने वाली सुजाता ने तपस्या के जर्जर सिद्धार्थ को पूजा के लिए खीर अर्पित की थी।

बौद्ध साहित्य के अनुसार इस प्रकार बैसाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के प्रत्येक सहयात्री, घटनाक्रम और जीवन परिवर्तन का पावन दिवस रहा है। इसे नियति की एक महती योजना ही समझना चाहिए कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ई. पू. बैसाख पूर्णिमा को हुआ। यह दिवस उनके और उनके अनुयायिओं के साथ तब से आज तक जुड़ा हुआ है। भगवान बुद्ध ने बैसाख पूर्णिमा ४८३ ई. पू. में ८० वर्ष की आयु में, देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया। उनका परम प्रिय शिष्य आनन्द, पत्नी यशोधरा, सारथी चन्ना और यहाँ तक की अश्व कटंक भी अपनी जीवन यात्रा का प्रारम्भ करने के लिए इसी दिन जन्मे। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ ने कठिन तपस्या कर बोधित्व प्राप्त किया उसका रोपण भी बैसाख पूर्णिमा को ही हुआ था। इसी दिन समाज में पतिता समझी जाने वाली सुजाता ने तपस्या के जर्जर सिद्धार्थ को पूजा के लिए खीर अर्पित की थी। बौद्ध साहित्य के अनुसार इस प्रकार बैसाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के प्रत्येक सहयात्री, घटनाक्रम और जीवन परिवर्तन का पावन दिवस रहा है। आज विश्व के कोने-कोने में बैसाख पूर्णिमा के शुभ अवसर को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है।

भगवान गौतम बुद्ध की जन्मस्थली होने के कारण भारत की धरती पर ही जन्मा है बौद्ध धर्म, प्रारम्भ से ही बौद्ध धर्म ने भारतीय जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। आज भी इस धर्म द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों की अपनी प्रासंगिकता है। यदि भगवान बुद्ध द्वारा दिखाए गए मार्ग पर हम चलने लगें तो विश्व को शान्ति के मार्ग पर आगे ले जाने के लिए हम एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। जब भगवान बुद्ध इस धरती पर अवतरित हुए तब चारों ओर हिंसा और स्वार्थ का बोलबाला था। हिंदू समाज को अनेकानेक कर्मकांडों ने अपने बंधनों में जकड़ा हुआ था। समाज के कुछ वर्ग अपने स्वार्थों की रक्षा के लिए अन्य वर्गों का शोषण करने में जुटे थे। बलि प्रथा का सर्वत्र प्रचलन था फलत: प्रतिदिन हज़ारों पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। पशु-पक्षियों के वध के कारण चारों ओर हिंसा का वातावरण बना हुआ था। लोगों की धर्म से आस्था उठने लगी थी। आज भी वैज्ञानिक प्रगति के कारण लोगों की धर्म में अनास्था बढ़ती जा रही है। भौतिकता की अधिकता के कारण उनके मन अविश्वासी और शंकालु बनते जा रहे हैं। आज हिंसा पहले की अपेक्षा कहीं अधिक भयावह आकार धारण किए पूरी मानवता को त्रस्त किए हुए है। अणु बमों के रूप में हिंसा की एक छोटी-सी चिंगारी सारी मानवता को तहस नहस करने में सक्षम समझी जा रही है। ऐसी स्थिति में अहिंसा ही एक ऐसा मूल मंत्र है जो मानव समाज की इस विनाश से रक्षा कर सकता है। यही वह बिन्दु है जहाँ गौतम बुद्ध आज की परिस्थितियों में भी उतने ही प्रासंगिक हो उठते हैं जितने आज से हज़ारों वर्ष पूर्व थे।

आज का मनुष्य जितना अधिक अधीर एवं असंयमी है उतना शायद पहले कभी नहीं रहा। वह रातों रात वह सब कुछ पा लेना चाहता है जो उसके पूर्वज सदियों में भी प्राप्त नहीं कर पाए थे। सब कुछ अपने पास ही समेट लेने की चाह ने जहाँ उसे स्वार्थी बनाया है वहीं उसे हिंसा का शिकार भी बना डाला है। फलस्वरूप वह मानसिक तनावों का शिकार हो कर लोभी, कामी, क्रोधी और हिंसक को उठा है। मानवीय मूल्यों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है। ऐसी हालत में गौतम बुद्ध के सिद्धांतों का शीतल मरहम ही उसके घावों को ठंड़क पहुँचा सकता है।

ऐसे समय में जब भारतीय समाज अनेकानेक कुरीतियों और कर्मकांड़ों में फँसा अस्त व्यक्त हो रहा था, गौतम बुद्ध ने जन्म लेकर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए अहिंसापरक सिद्धान्तों की स्थापना की। गौतम बुद्ध का उस समय के समाज और आने वाली पीढ़ियों पर इतना अधिक प्रभाव हुआ कि उन्हें सहज रूप से ही विष्णु का दसवाँ अवतार मान लिया गया। लोगों की यह धारणा समय के साथ-साथ दृढ़ से दृढ़तर होती गई कि जैसे राम और कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु ने धरती पर अवतार लिया था वैसे ही पशु हिंसा को रोकने एवं मानव को शान्ति का मार्ग दिखाने के लिए गौतम बुद्ध इस पृथ्वी पर अवतरित हुए। सिद्धार्थ के रूप में भगवान गौतम बुद्ध का जन्म राजा शुद्धोधन के यहाँ लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ। नेपाल की तराई में स्थित यह स्थान उनकी राजधानी कपिलवस्तु के समीप ही है। राजा शुद्धाधन शाक्य क्षत्रिय वंश के एक अच्छे शासक थे। सिद्धार्थ की माता महामाया कौशल राजवंश की राजकुमारी थी। बचपन में ही सिद्धार्थ की माता का स्वर्गवास होने के कारण उनका लालन पालन विमाता महाप्रजापति गौतमी ने किया। राजवंशीय परम्पराओं के अनुरूप ही उनका लालन-पालन अति वैभवपूर्ण वातावरण में हुआ।

बचपन से ही सिद्धार्थ परपीड़ा से विचलित हो उठते थे। किसी को भी कष्ट में देख कर उसकी सहायता करने की उनके मन में एक सहज ललक थी। ज्योतिषियों ने राजा शुद्धोधन को सचेत कर दिया था कि यदि उनका पुत्र चक्रवर्ती सम्राट नहीं बन पाया तो सन्यासी हो जाएगा। सिद्धार्थ का मन इसी दुनिया के भोग विलास में रम कर रह जाए इसके लिए हर प्रकार के साधन उपलब्ध कराए गए और १८ वर्ष की अवस्था में एक रूपमती कन्या यशोधरा से उनका विवाह कर दिया गया। जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो सिद्धार्थ ने उसका नाम राहुल अर्थात बन्धन रख दिया परन्तु यह बन्धन भी उनके लिए पगबाधा नहीं बन सका। सिद्धार्थ अपने जीवन में मोहमाया को बन्धन मानते थे फलत: शीघ्र ही उन्होंने परिवार के सब बन्धन तोड़ डाले और २१ वर्ष की युवावस्था में ज्ञान की खोज में घर से निकल पड़े।

गृह त्याग के पश्चात सिद्धार्थ ने निरंजना नदी के तट पर पीपल के एक वृक्ष के नीचे घोर तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया, इसी ज्ञान की ज्योति कालान्तर में भारत ही नहीं विश्व के कोने कोने में फैली। आज भी मानवता इसके आलोक में आलोकित हो रही है। ज्ञान की इस दिव्य ज्योति के कारण राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाए। गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं के संबंध में अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। सारनाथ नामक ग्राम के एक उपवन में बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का महामंत्र गूँज उठा, दु:ख, अज्ञान और परस्पर वैमनस्य से त्रस्त लोग इस अवतरित महापुरुष के समक्ष नतमस्तक होने लगे। गौतम ने जन जन को अन्धविश्वासों, आतंक, हिंसा और स्वार्थ की संकुचित प्रवृतियों को उतार फेंकने का उपदेश दिया। उन्होंने सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए सत्य, अहिंसा और प्रेम का सन्देश दिया। जन-जन को प्राणीमात्र के लिए दया, ममता, परस्पर मेल जोल और अपरिग्रह का पाठ पढ़ाया।

इसी शताब्दि के मध्य में महात्मा गांधी ने गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप दिया। यही कारण है कि महात्मा गांधी को वर्तमान युग का बुद्ध कहा जाने लगा। महात्मा गांधी के इस प्रयास ने बुद्ध की वर्तमान समय में प्रासंगिकता को भी सर्व सिद्ध कर दिखाया।

गौतम बुद्ध ने लगभग ४० वर्ष तक घूम घूम कर अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया। वह उन गिने चुने महात्माओं में से थे जिनके जीवन में ही उनके सिद्धांतों का प्रसार तेज़ी से हुआ और उन्होंने अपने द्वारा लगाए गए पौधे को वृक्ष बन कर पल्लवित होते हुए स्वयं देखा। गौतम बुद्ध ने बहुत ही सहज वाणी और सरल भाषा में अपने विचार लोगों के सामने रखे। अपने धर्म प्रचार में उन्होंने समाज के सभी वर्गों, अमीर गरीब, ऊँच नीच तथा स्त्री-पुरुष को समानता के आधार पर सम्मिलित किया। किसी के मार्ग दर्शन में भी उन्होंने किसी प्रकार का भेद भाव नहीं किया। उन्होंने संघ की स्थापना की जहाँ सभी लोग मिल जुल कर समाज के उत्थान के लिए कार्य करते थे और उसमें अपना अपना योगदान देते थे। बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की घोषणा करते हुए कहा कि उनके निवारण के लिए हर व्यक्ति प्रयास करने में सक्षम है। बुद्ध मानते थे कि संसार दु:खमय है, दु:खों का कोई न कोई कारण है, दु:ख का निरोध है और दु:ख निरोध का उपाय भी है। उन्होंने अविद्या को दु:ख का मूल कारण माना। मन, वचन और कर्म से साधना के मार्ग पर चलने के लिए उन्होंने सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक संकल्प, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि को अनिवार्य बताया। महात्मा बुद्ध का मानना था कि साधना द्वारा सर्वोच्च सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। यही अवस्था बुद्ध कहलाती है और इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।

यद्यपि बौद्ध धर्म का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ फिर भी अन्य भारतीय धर्मों की भान्ति बौद्ध धर्म में ईश्वर और आत्मा के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं किया गया। गौतम बुद्ध ने अपने आप को आत्मा और परमात्मा के निरर्थक विवादों में फँसाने की अपेक्षा समाज कल्याण की ओर अधिक ध्यान दिया। उनके उपदेश अधिकतर सामाजिक एवं संसारिक समस्याओं तक ही सीमित रहे। यही कारण है कि उनकी बात लोगों की समझ में सहज रूप से ही आने लगी। महात्मा बुद्ध ने मध्यममार्ग अपनाते हुए अहिंसा युक्त दस शीलों का प्रचार किया तो लोगों ने उनकी बातों से स्वयं को सहज ही जुड़ा हुआ पाया। बुद्ध का मानना था कि मनुष्य यदि अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर ले तो वह निर्वाण प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उन्होंने पुरोहितवाद पर करारा प्रहार किया और व्यक्ति के महत्त्व को प्रतिष्ठित किया।

मानवता को बुद्ध की सबसे बड़ी देन है भेदभाव को समाप्त करना। यह एक विडम्बना ही है कि बुद्ध की इस धरती पर आज तक छूआछूत, भेदभाव किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। उस समय तो समाज छूआछूत के कारण अलग अलग वर्गों में विभाजित था। बौद्ध धर्म ने सबको समान मान कर आपसी एकता की बात की तो बड़ी संख्या में लोग बौद्ध मत के अनुयायी बनने लगे। अभी कुछ ही दशक पूर्व डाक्टर भीमराव आम्बेडकर ने भारी संख्या में अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध मत को अंगीकार किया ताकि हिन्दुओं समाज में उन्हें बराबरी का स्थान प्राप्त हो सके। बौद्ध मत के समानता के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप देना आज भी बहुत आवश्यक है। हिन्दुओं धर्म में आई कुरीतियों का विरोध करने के कारण कुछ विद्वान बौद्ध मत को हिन्दुओं धर्म से पृथक नहीं मानते। उनके विचार में मूलत: बौद्ध मत हिन्दुओं धर्म के अनुरूप ही रहा और हिन्दुओं धर्म के भीतर ही रह कर महात्मा बुद्ध ने एक क्रान्तिकारी और सुधारवादी आन्दोलन चलाया।

बौद्ध धर्म हर प्रकार के भेद भाव से सर्वथा मुक्त रहा। किसी भी प्रकार के भेद को निर्वाण के मार्ग में बाधा नहीं माना गया। गौतम बुद्ध ने अत्यन्त कुशलता से बौद्ध भिक्षुओं को संगठित किया और लोकतांत्रिक रूप में उनमें एकता की भावना का विकास किया। इसका अहिंसा का सिद्धांत इतना लुभावना था कि सम्राट अशोक ने दो वर्ष बाद इससे प्रभावित होकर बौद्ध मत को स्वीकार किया और युद्धों पर रोक लगा दी। इस प्रकार बौद्ध धर्म को राजाश्रय प्राप्त हो गया। सिद्धार्थ का क्षत्रिय कुल इस धर्म का संरक्षक बना और बौद्ध मत देश की सीमाएँ लांघ कर विश्व के कोने-कोने तक अपनी ज्योति फैलाने लगा। आज भी इस धर्म की मानवतावादी, बुद्धिवादी और जनवादी परिकल्पनाओं को नकारा नहीं जा सकता और इनके माध्यम से भेद भावों से भरी व्यवस्था पर ज़ोरदार प्रहार किया जा सकता है। यही धर्म आज भी दु:खी एवं अशान्त मानवता को शान्ति प्रदान कर सकता है। ऊँच नीच के अभाव में लोगों के मन में धार्मिक एकता का विकास कर सकता है। विश्व शान्ति एवं परस्पर भाईचारे का वातावरण निर्मित करके कला, साहित्य और संस्कृति के विकास के मार्ग को प्रशस्त कर सकता है।

जिंदगी

pearl
१—
कोई एक दिन में ही
नहीं मोती बनता –
न किस्मत, चमचमाती है |
पहले बूँद होती है
सीप में पड़ती है
समुद्र में रहती है —
तब कहीं
स्वांति की बूँद
मोती कहलाती है |
gold
२–
यूं नहीं बनता
कभी सोना –
पहले खान से निकालता है
फिर पड़ता है
कई बार
पानी – ऐ – तेजाब से धोना –
ततपश्चात
सुनार की
चोट-पे-चोट
वो सहता है –
तब आग में तपकर
अपने-आप को
वो सोना कहता है !!
jai saf
३–
एक व्यक्ति
खुद रहकर गन्दा
हमें, हमारे पड़ोस को
करता है साफ –
होता नहीं उसके साथ इंसाफ |
उसे हम दुत्कारते हैं
उससे दूर भागते हैं
उसके गन्दा होने में
क्या उसका दोष है ?
या—
हम हैं इसके लिए जिम्मेदार
क्योंकि !
गन्दगी हम ही तो फैलाते हैं ,
घर हो या ट्रेन
साफ करता है वह
करता अपना धंधा —
प्रश्न —
कौन है गन्दा ??
द्वारा–गुलाब चन्द जैसल
नोट : सारे अधिकार कवि के अधीन हैं

भारतीय रेल

संरक्षा, सुरक्षा , समय पालन
है—
भारतीय रेल का सन्देश
पर ,
कर नहीं पति
अपने सामान ,
पेड़-पौधों ,
जमीनों का संरक्षण |
किसी यात्री की सुरक्षा ,
औ समय पालन –?
बीस-बीस घंटे
होती है लेट —
ये है ,
भारतीय रेल के
संकल्प का ‘वेट’ !!
—गुलाब चन्द जैसल

२६-०१-०७ को मुगलसराय स्टेशन पर गाड़ी के बीस घंटे लेट होने के कारण रेलवे पर कवि द्वारा लिखी गयी कवितामाँ 463671-rail-passangers-unreservedतुझे सलाम !!माँ तुझे सलाम !!

माँ तुझे सलाम !!

माँ तुझे सलाम !!
तेरा दूध पिया माँ मैंने
तेरी गोद में रोया
दुःख में सुख तेरा अंचल मैया
तेरी गोद में सोया |
मर जाना , मिट जाना तुझ हित
बस मेरा ये काम
माँ तुझे सलाम !
तेरी मिट्टी में पैदा हैं
सारे खशो-आम
माँ तुझे सलाम !!

जीवन ऐसा ही है

रोज‌ रात को तरुशिखरों पर बोला  करते उल्लू। सोते-सोते जग जाता है , मेरे घर का गिल्लू॥ काँव-काँव  कौवे को पाकर बच्चे दौड़ा करते हैं- कभी-कभी तो खुद ही वो आपस में रोड़ा करते हैं। सुबह-सवेरे जब पेड़ों …

Source: जीवन ऐसा ही है

जीवन ऐसा ही है

रोज‌ रात को तरुशिखरों पर बोला  करते उल्लू।

सोते-सोते जग जाता है , मेरे घर का गिल्लू॥
काँव-काँव  कौवे को पाकर बच्चे दौड़ा करते हैं-
कभी-कभी तो खुद ही वो आपस में रोड़ा करते हैं।
सुबह-सवेरे जब पेड़ों पर चिड़िया चहका करती हैं–

उठ जाते हैं घर के बच्चे, कलियाँ महका करती हैं।
कहीं कबूतर करें गुटरगूँ, चीं-चीं करती गौरैया–
रम्भाती गायों का स्वर है, चिल्लाती है मईया।
में-में करती भेंड़-बकरियाँ, चरवाहे घूमा करते हैं–
दिनभर की निदाध दुपहरी में वो जीते-मरते हैं।
जीवन ऐसा ही है प्यारे सुख-दुख से परिपूरित–
रहो प्रसन्न होकर दुनिया में हो जाओ सम्पूरित्।

First blog post

पलास के फूल

 पलास का विवरण–पलास, ढाक(देशी भाषा), रोयेडा(राजस्थानी)  

 वानस्पतिक नाम– बुटिया फ्रोंडोसा

 संस्कृत नाम – पलास

 अंग्रेजी नाम—फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट

सामान्य नाम—पलास, ढाक
Drug Class: Astringent, diuretic, depurative, aphrodisiac, d-galactose-binding lectins,                 anti-inflammatory

Indication: Diarrhoea, skin disorders, diabetes, leucorrhoea, eye diseases, filaria, herpes

Parts Used:  flower,gum, seed, leaf

—मार्च से अप्रैल तक के महीने में केसरिया रंग से भरा खंखड़ पलास अप्रतिम सौंदर्य लिए हुए होता है। खंखड़ इसलिए क्योंकि इस समय इस पेड़पर पत्ते नहीं होते या तो बहुत ही कम होते हैं, अथवा आधे सूखे आधे हरे होते हैं। हिंदू संस्कृति में पलास का बड़ा महत्व है, खास तौर पर श्राद्धपर्वके समय क्योंकि इसे पवित्र माना जाता है। इसी के पत्तों का दोना बनाकर श्राद्ध पर्व माह में पूर्वजों को खीर और पूड़ी चढाई जाती है।

पलास मैदानी इलाकों से लेकर सूखे, बंजर, पहाड़ी इलाकों तक खूब पाया जाता है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड़,छत्तीसगढ़,  मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, आदि में बहुतायत में पाया  जाता है। परंतु, आज के समय में असंरक्षित जंगलों के प्रति लोगों की सोच के बदलने और इंधन के उपयोग के लिए इसके काटे जाने  से यह समाप्ति की कगार पर है। खास तौर पर मैदानी इलाकों में । मुझे याद है कि श्राद्ध पर्व पर मेरी मॉ कहती थी कि जाओ पलास के आठ –दस पत्ते लेकर आओ, तब हम पूछते थे कि क्या होंगे, तो मॉ कहती थी कि अपने पूर्वजों को भोजन कराना है। तब हमारा प्रश्न होता था कि पलास के पत्तों में ही क्यों किसी बर्तन में क्यों नहीं? तो मॉ का कहना होता था कि पलास एक पवित्र पेड़ है जिसमें दिए गए भोजन को हमारे पूर्वज स्वीकार करते हैं। हम सभी साथी अपनी पूरी टोली के साथ पलास के पत्ते लेने के लिए चल देते थे, पर बहुत ढूँढने पर हमे एकाध पलास वृक्ष मिल जाता था और हम सभी में मारा- मारी हो जाती थी कि मैं पहले पत्ते लूँगा फिर कोई और, क्योंकि पत्ते ही बहुत कम होते थे। पहले उत्तर-प्रदेश और बिहार में एक आदिवासी जनजाति जिसकी रोजी-रोटी इससे चला करती थी अब उनको दूसरे उपाय ढूँढने पड़्ते हैं । उनकी रोजी-रोटी छिनने में जहॉ पेड़ों का कम होना है वहीं लोगों का रुझान कृतिम पत्तलों की तरफ होना भी है। खैर हम पलास की बात करते हैं—अब पलास समाप्ति की कगार पर है।

पर हरियाणा में गुड़गॉव से फरीदाबाद की ओर जाने वाले हाइवे पर एक दिन मैं देखा कि सड़क किनारे ढेर सारे पलास फूले हैं, देखकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। और मैं इसके प्रति अपने मोह को छोड़ नहीं पाया और अपनी दुपहिया वाहन से तुरत उतर गया और उसके फूलों के सौंदर्य का आनंद लेने लग गया जिस प्रकार फूलों को देखकर भौंरा मदमस्त हो जाता है मैं भी मदमस्त हुए बिना नहीं रह सका और अपने कैमरे से ढेर सारे छायचित्र पलास के फूलों के निकाल लिए। वैसे पलास के फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था ‘’मानो बैशाख माह के आगमन से पलास फूल कर कुप्पा हो गया हो।‘’  परंतु, यहॉं भी यह देखनेको मिल रहा है कि कुछ तो सड़क के चौड़ीकरण के कारण और कुछ बढ़्ती भीड़ के लिए कंक्रीट के जंगलों के खड़े होने के कारण इन पलास के पेड़ों का ह्रास हो रहा है। आने वाले समय में शायद पलास/ढाक देखने को भी न मिले। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने भी अपने एक निबंध शिरीष के फूल में पलास, गुलमोहर, शिरीष, अर्जुन, पुन्नाग, पुनर्नवा आदि का जि‌क्र बड़ी फिक्र के साथ किया है। क्योंकि अब शिरीष भी लोगों की समृद्धि का प्रतीक नहीं रह गया है। हालॉकि डी. एल. एफ. फेस-3 की तरफ नीलकंठ अस्पताल से आगे एक शिरीष रोड देखकर बड़ा ही अच्छा लगा। इस मार्ग पर ढेर सारे शिरीष के पेड़ लगे हुए हैं। खास तौर पर ये तब और अच्छे लगते हैं जब इनमें फूल लगे हों।

Posted 2th june 2016 by गुलाब चंद जैसल