जीवन ऐसा ही है

रोज‌ रात को तरुशिखरों पर बोला  करते उल्लू।

सोते-सोते जग जाता है , मेरे घर का गिल्लू॥
काँव-काँव  कौवे को पाकर बच्चे दौड़ा करते हैं-
कभी-कभी तो खुद ही वो आपस में रोड़ा करते हैं।
सुबह-सवेरे जब पेड़ों पर चिड़िया चहका करती हैं–

उठ जाते हैं घर के बच्चे, कलियाँ महका करती हैं।
कहीं कबूतर करें गुटरगूँ, चीं-चीं करती गौरैया–
रम्भाती गायों का स्वर है, चिल्लाती है मईया।
में-में करती भेंड़-बकरियाँ, चरवाहे घूमा करते हैं–
दिनभर की निदाध दुपहरी में वो जीते-मरते हैं।
जीवन ऐसा ही है प्यारे सुख-दुख से परिपूरित–
रहो प्रसन्न होकर दुनिया में हो जाओ सम्पूरित्।

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