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पलास के फूल

 पलास का विवरण–पलास, ढाक(देशी भाषा), रोयेडा(राजस्थानी)  

 वानस्पतिक नाम– बुटिया फ्रोंडोसा

 संस्कृत नाम – पलास

 अंग्रेजी नाम—फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट

सामान्य नाम—पलास, ढाक
Drug Class: Astringent, diuretic, depurative, aphrodisiac, d-galactose-binding lectins,                 anti-inflammatory

Indication: Diarrhoea, skin disorders, diabetes, leucorrhoea, eye diseases, filaria, herpes

Parts Used:  flower,gum, seed, leaf

—मार्च से अप्रैल तक के महीने में केसरिया रंग से भरा खंखड़ पलास अप्रतिम सौंदर्य लिए हुए होता है। खंखड़ इसलिए क्योंकि इस समय इस पेड़पर पत्ते नहीं होते या तो बहुत ही कम होते हैं, अथवा आधे सूखे आधे हरे होते हैं। हिंदू संस्कृति में पलास का बड़ा महत्व है, खास तौर पर श्राद्धपर्वके समय क्योंकि इसे पवित्र माना जाता है। इसी के पत्तों का दोना बनाकर श्राद्ध पर्व माह में पूर्वजों को खीर और पूड़ी चढाई जाती है।

पलास मैदानी इलाकों से लेकर सूखे, बंजर, पहाड़ी इलाकों तक खूब पाया जाता है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड़,छत्तीसगढ़,  मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, आदि में बहुतायत में पाया  जाता है। परंतु, आज के समय में असंरक्षित जंगलों के प्रति लोगों की सोच के बदलने और इंधन के उपयोग के लिए इसके काटे जाने  से यह समाप्ति की कगार पर है। खास तौर पर मैदानी इलाकों में । मुझे याद है कि श्राद्ध पर्व पर मेरी मॉ कहती थी कि जाओ पलास के आठ –दस पत्ते लेकर आओ, तब हम पूछते थे कि क्या होंगे, तो मॉ कहती थी कि अपने पूर्वजों को भोजन कराना है। तब हमारा प्रश्न होता था कि पलास के पत्तों में ही क्यों किसी बर्तन में क्यों नहीं? तो मॉ का कहना होता था कि पलास एक पवित्र पेड़ है जिसमें दिए गए भोजन को हमारे पूर्वज स्वीकार करते हैं। हम सभी साथी अपनी पूरी टोली के साथ पलास के पत्ते लेने के लिए चल देते थे, पर बहुत ढूँढने पर हमे एकाध पलास वृक्ष मिल जाता था और हम सभी में मारा- मारी हो जाती थी कि मैं पहले पत्ते लूँगा फिर कोई और, क्योंकि पत्ते ही बहुत कम होते थे। पहले उत्तर-प्रदेश और बिहार में एक आदिवासी जनजाति जिसकी रोजी-रोटी इससे चला करती थी अब उनको दूसरे उपाय ढूँढने पड़्ते हैं । उनकी रोजी-रोटी छिनने में जहॉ पेड़ों का कम होना है वहीं लोगों का रुझान कृतिम पत्तलों की तरफ होना भी है। खैर हम पलास की बात करते हैं—अब पलास समाप्ति की कगार पर है।

पर हरियाणा में गुड़गॉव से फरीदाबाद की ओर जाने वाले हाइवे पर एक दिन मैं देखा कि सड़क किनारे ढेर सारे पलास फूले हैं, देखकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। और मैं इसके प्रति अपने मोह को छोड़ नहीं पाया और अपनी दुपहिया वाहन से तुरत उतर गया और उसके फूलों के सौंदर्य का आनंद लेने लग गया जिस प्रकार फूलों को देखकर भौंरा मदमस्त हो जाता है मैं भी मदमस्त हुए बिना नहीं रह सका और अपने कैमरे से ढेर सारे छायचित्र पलास के फूलों के निकाल लिए। वैसे पलास के फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था ‘’मानो बैशाख माह के आगमन से पलास फूल कर कुप्पा हो गया हो।‘’  परंतु, यहॉं भी यह देखनेको मिल रहा है कि कुछ तो सड़क के चौड़ीकरण के कारण और कुछ बढ़्ती भीड़ के लिए कंक्रीट के जंगलों के खड़े होने के कारण इन पलास के पेड़ों का ह्रास हो रहा है। आने वाले समय में शायद पलास/ढाक देखने को भी न मिले। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने भी अपने एक निबंध शिरीष के फूल में पलास, गुलमोहर, शिरीष, अर्जुन, पुन्नाग, पुनर्नवा आदि का जि‌क्र बड़ी फिक्र के साथ किया है। क्योंकि अब शिरीष भी लोगों की समृद्धि का प्रतीक नहीं रह गया है। हालॉकि डी. एल. एफ. फेस-3 की तरफ नीलकंठ अस्पताल से आगे एक शिरीष रोड देखकर बड़ा ही अच्छा लगा। इस मार्ग पर ढेर सारे शिरीष के पेड़ लगे हुए हैं। खास तौर पर ये तब और अच्छे लगते हैं जब इनमें फूल लगे हों।

Posted 2th june 2016 by गुलाब चंद जैसल

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