मुहावरा (डूबते को तिनके का सहारा)

tortilis_grande

एक पेड़ था

छातों भरा आकाश में-

मुझे क्या छाँव देगा

मुझे क्या शीतलता देगा

दुःख भरी दुपहरी में?

बेकार का पेड़ है-

पहले मैं सोचता था ।

एक दिन –

मैं गुज़र रहा था

भरी दुपहरी में

बेहाल था, पसीने से  तर-बतर

कुछ सूझ नहीं  रहा था-

उसी छतरी भरी  छाँव में –

तब समझ में आया –

डूबते को तिनके का सहारा॥

—-गुलाब चन्द जैसल

 

 

 

 

 

 

 

 

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